161 भारत-बांग्लादेश से सटे क्षेत्रों में बीजेपी को काफी वोट मिले,टीएमसी को एकमुश्त मुस्लिम वोट, किसके साथ रहे दलित, आदिवासी? जानिए पश्चिम बंगाल चुनाव में वोटों का गणित TMC और बीजेपी ने रणनीतिक प्रचार पर दांव लगाया (crime bhaskar news.com-Editor Umesh Shukla)


   (crime bhaskar news.com-Editor Umesh Shukla) 05-05-21

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने 2011 और 2016 में टीएमसी ने क्रमश: 184 और 211 सीटों पर कब्जा जमाया था। 2011 में बीजेपी कोई सीट नहीं जीत पाई थी, लेकिन 2016 में उसने 3 सीटों पर कब्जा किया। 2019 के लोकसभा चुनाव में भगवा दल ने 42 में से 18 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की। उस परिणाम के मुताबिक, बीजेपी 121 विधानसभा सीटों पर आगे थी, लेकिन 8 चरणों में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान कुछ जिलों में तस्वीर बदल गई। 

उत्तर और दक्षिण बंगाल में बीजेपी ने भारत-बांग्लादेश से सटे क्षेत्रों में बीजेपी को काफी वोट मिले, जहां 1947 और 1971 के बाद पूर्वी पाकिस्तान से आए हिंदुओं की काफी आबादी है। यह मालदा और मुर्शिदाबाद में भी हुआ जहां मुसलमानों की आबादी अधिक है। मालदा जिले में मुसलमानों की आबादी में हिस्सेदारी 51.27 फीसदी है, बीजेपी ने हबीबपुर सीट को 47.52 फीसदी वोटों के साथ कब्जाया, जबकि टीएमसी को यहां 37.66 फीसदी वोट मिले। यह मालदा की उन 5 सीटों में से है जिनपर बीजेपी को जीत मिली, शेष 7 सीटें टीएमसी के खाते में गईं। साथ सटे मुर्शिदाबाद में, जोकि दक्षिण बंगाल का हिस्सा है, मुसलमानों की आबादी में हिस्सेदारी 66.28 फीसदी है, यह बंगाल के सभी जिलों में सर्वाधिक है। मुर्शिदाबाद जिले में बीजेपी ने 20 में से 2 सीटों पर जीत हासिल की। ये मुर्शिदाबाद और बरहामपुर की शहरी सीटें हैं, जहां हिंदुओं की आबादी अधिक है। 2019 में बीजेपी की सफलता का श्रेय ऊंची हिंदू जातियों, आदिवासियों और दलितों में इसकी पहुंच को दिया गया था। राज्य में पंजीकृत एससी समुदाय में उत्तर बंगाल के राजबंशी और दक्षिण बंगाल में नामसूद्र की संख्या सबसे अधिक है। इन्हें बीजेपी ने अपने पाले में लाने की पूरी कोशिश की थी। नामसूद्र में 4 फीसदी आबादी मतुआ समुदाय की है। 

बंगाल में एससी समुदाय में 14 और जातियां हैं जो राजबंशी या नामसूद्र का हिस्सा नहीं हैं। अलग-अलग जातियों, उप-जातियों, धर्मों और भाषाई समूहों के वोट हासिल करने के लिए टीएमसी और बीजेपी ने रणनीतिक प्रचार पर दांव लगाया था। 

पश्चिम मिदनापुर, पुरुलिया, बांकुरा, और झारग्राम जिलों में फैले जंगलमहल में भी टीएमसी और बीजेपी में कड़ी टक्कर हुई, जबकि 2019 में बीजेपी को यहां अधिक सफलता मिली थी। यहां आदिवासियों की अच्छी आबादी है। 2011 की जनगणना में राज्य में अनुसूचित जनजाति (एसटी) आबादी 50 लाख से अधिक थी, जोकि कुल आबादी का 5.8 फीसदी हिस्सा है। पिछले कुछ सालों में ममता बनर्जी ने आदिवासी समुदायों के लिए अलग वेलफेयर बोर्ड की स्थापना की। इन जिलों में नई सड़कें, अस्पताल, स्कूल और पोलिटेक्निक कॉलेज खोले गए।

 13 विधानसभा सीटों वाले बांकुरा जिला दो लोकसभा सीटों का हिस्सा है, बांकुरा और बिष्णुपर, जिन्हें 2019 में बीजेपी ने जीता था। बीजेपी को मिदनापुर, झारग्राम और पुरुलिया सीटों पर भी जीत हासिल हुई थी। विधानसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि आदिवासी इलाकों में कड़ी टक्कर हुई और बीजेपी ने बांकुरा जिले में 12 में से 7 सीटों पर कब्जा किया। मुकाबला इतना नजदीकी था कि बांकुरा सीट पर बीजेपी ने टीएमसी उम्मीदवार को एक फीसदी से कम वोटों से हराया। 

साथ लगे पुरुलिया जिले में टीएमसी तीन सीटों पर कब्जा कर पाई, जबकि 9 सीटें बीजेपी के खाते में गईं। टीएमसी ने इसकी भरपाई पश्चिम मिदनापुर में की, जहां इसने 13 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि बीजेटी को खरगपुर और घाटल सीट पर जीत मिली। कहीं छोटे जिले झारग्राम में टीएमसी ने सभी 4 सीटों को अपने पास बरकरार रखा। 

बीजेपी के राज्य महासचिव सायंतन बसु कहते हैं, ''दक्षिण बंगाल के कई जिलों जैसे पुरुलिया और बांकुरा में में हमारा प्रदर्शन खराब नहीं रहा। टीएमसी ने हमें कोलकाता, हावड़ा, हुगली और साउथ 24 परगना जिलों में पीछे छोड़ा।'' इन जिलों में हिंदुओं और मुसलमानों की मिश्रित आबादी है।

धार्मिक ध्रुवीकरण के साथ उत्तर 24 परगना और नादिया जिलों में जातिगत राजनीति भी एक अहम फैक्टर रहा, जहां हिंदू दलित समुदाय की अच्छी मौजूदगी है। 2019 में बीजेपी ने दलितों के अधिकतर वोट हासिल करके नादिया और उत्तर 24 परगना के रानाघाट और बोनगांव लोकसभा सीट पर जीत हासिल की थी।  

दलितों को आकर्षित करने के लिए भगवा दल ने बंगाल में सीएए को लागू करने का वादा किया था ताकि मतुआ समुदाय के लोगों को नागरिकता मिल सके, जोकि नामसूद्र समुदाय में शामिल हैं और बांग्लादेश से शरणार्थी के तौर पर आए थे। बोनगांव से बीजेपी के सांसद और ऑल इंडिया मतुआ महासंघ के प्रमुख शांतनु ठाकुर ने कहा, ''नतीजे बताते हैं कि मतुआ समुदाय बीजेपी के साथ रहा।''

बंगाल में 294 सीटें हैं, लेकिन वोट 292 सीटों पर पड़े थे, क्योंकि जांगीपुर और समशेरगंज में दो प्रत्याशियों की मौत कोरोना की वजह से हो गई। सोमवार को चुनाव आयोग ने इन दोनों सीटों पर वोटिंग को अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया है। पहले 16 मई को मतदान कराने का फैसला लिया गया था। 292 में से 213 सीटें जीत लीं तो पिछली बार 3 सीटों पर सिमटी बीजेपी ने इस बार 77 सीटें हासिल की हैं। नतीजों के विश्लेषण से पता चलता है कि 240 विधानसभा क्षेत्रों वाले दक्षिण बंगाल में तृणमूल कांग्रेस बहुत से हिंदुओं, आदिवासी और दलित वोटर्स को दोबारा जोड़ने में सफल रही, जिन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का साथ दिया था। दूसरी तरफ उत्तर बंगाल में टीएमसी के दो प्रमुख मंत्री हार गए तो बीजेपी ने 54 में से 30 सीटों पर कब्जा जमाया।

सोमवार 03-05-21 को आए नतीजों के बाद चुनाव आयोग ने बताया कि टीएमसी को बंगाल में 47.9 फीसदी वोट मिले तो बीजेपी की हिस्सेदारी 38.1 फीसदी रही। दोनों पार्टियों में करीब 98 फीसदी वोटों का अंतर रहा। 2011 में भी जब टीएमसी और कांग्रेस ने साथ चुनाव लड़ा था, लेफ्ट फ्रंट को 7.4 फीसदी कम वोट मिले थे। 

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