139 आरक्षण और भारत राजनीति का बन चुका हथियार ....70 वर्ष बाद रार ---आरक्षण किसी का मौलिक अधिकार नहीं है:सुप्रीम कोर्ट ने कहा


 


 



नई दिल्ली: जब हमारे संविधान निर्माताओं ने आरक्षण लागू किया था, तो उस समय ये कहा गया था कि आरक्षण सिर्फ 10 वर्ष के लिए होगा लेकिन आरक्षण को ऐसी जरूरत बना दिया गया कि 70 वर्ष बाद भी इसका कोई अंत नहीं है.  सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में एक बड़ी बात कही है कि आरक्षण किसी का मौलिक अधिकार नहीं है भारत भी बड़ा अजीब देश है. भारत में राजनैतिक पार्टियां कभी किसी मुद्दे पर एक नहीं होतीं. चाहे कोरोना वायरस का मुद्दा हो, पाकिस्तान  और चीन से मुकाबले की बात हो, देश की सुरक्षा का मुद्दा हो या फिर श्रमिकों के पलायन का विषय. किसी भी मुद्दे पर देश की राजनैतिक पार्टियां कभी एकजुट नहीं होतींआरक्षण को ऐसी जरूरत बना दिया गया कि 70 वर्ष बाद भी इसका कोई अंत नहीं है. आरक्षण किसी पिछड़े व्यक्ति के अधिकार से ज्यादा राजनीति का हथियार बन चुका है.लेकिन एक मुद्दा ऐसा है जिस पर सारी पार्टियां एक साथ आ जाती हैं और वो है आरक्षण का मुद्दा.आजादी के आरक्षण किसी पिछड़े व्यक्ति के अधिकार से ज्यादा राजनीति का हथियार बन चुका है. ये बात हम क्यों कह रहे हैं, इसे आप आरक्षण से जुड़े एक मामले पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को हुई सुनवाई से समझ सकते हैं.बाद और अगर जरूरत पड़ी तो इसे आगे बढ़ाया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट तमिलनाडु की कई राजनैतिक पार्टियां इकट्ठा होकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गईं और ये मांग करने लगींतमिलनाडु में NEET के तहत हो रहे मेडिकल कॉलेज में एडमिशन पर कही है. NEET की परीक्षा राष्ट्रीय स्तर पर मेडिकल और डेंटल कोर्स में एडमिशन के लिए होती है.  कि जिस तरह से तमिलनाडु अपने राज्य में 50 प्रतिशत OBC आरक्षण देता है. उसी तरह ऑल इंडिया कोटा के तहत मेडिकल और डेंटल कोर्स की सीटों पर भी 50 प्रतिशत OBC आरक्षण होना चाहिए.इसके लिए तमिलनाडु सरकार के अलावा उनके विरोधी डीएमके, सीपीएम, सीपीआई, कांग्रेस जैसी पार्टियों ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और ये कहा कि मेडिकल कॉलेज की सीटों पर 50 प्रतिशत OBC आरक्षण ना देना, संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है. इसे संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मूल अधिकारों के उल्लंघन का मामला बताया.लेकिन सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने तमिलनाडु के इन राजनैतिक दलों की याचिका को सुनने से ही इनकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने इन दलों के वकीलों से पूछा कि इस मामले में किन संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है.जब इन दलों के वकीलों ने कहा कि इसमें शिक्षा के अधिकार और आरक्षण के अधिकार का उल्लंघन किया गया है . सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी दलों से अपनी याचिका वापस लेने और मद्रास हाईकोर्ट जाने को कहा.तो इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी ये दावा नहीं कर सकता कि आरक्षण का अधिकार एक मौलिक अधिकार है. आरक्षण देने से इनकार करना किसी भी संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता हैसुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच के सामने जब ये याचिका आई, तो उन्होंने भी इस बात पर हैरानी जताई कि कैसे एक दूसरे के राजनैतिक विरोधी इस मामले में एक साथ आ गए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है सभी दलों की इस मामले में बहुत अधिक रुचि है. कुछ वकीलों ने कहा कि ऐसा तो पहले भी हो चुका है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तमिलनाडु में तो ऐसा पहले कभी नहीं हुआ.

आरक्षण के                   इस मामले में एक बात पर ध्यान देने वाली है कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने के लिए तमिलनाडु के ज्यादातर राजनीतिक दलों ने एक गठबंधन बना लिया और सब यही बात करने लगे कि मेडिकल सीटों में 50 प्रतिशत OBC आरक्षण मिलना चाहिए. हम इसीलिए बार-बार कहते हैं कि आरक्षण को अधिकार से ज्यादा राजनैतिक हथियार मानाजाता है. अब जरा सोचिए कि हमारे देश में कौन सा ऐसा मुद्दा है, जिस पर सभी पार्टियां एक हो जाती हैं. अभी चीन के साथ सीमा पर तनाव चल रहा है, उसपर हम देख रहे हैं कि किस तरह से राहुल गांधी राजनीति कर रहे हैं. अभी कोरोना महामारी तेजी से फैल रही है, पूरा देश देख रहा है कि किस तरह से राजनीति हो रही है. प्रवासी मजदूरों के मामले में जिस तरह की राजनीति हुई वो सभी ने देखी है.

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